ज़ालिम हुक्मरान, ग़ाफ़िल अवाम

Hindi Urdu Poetry Stories
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एहसासे ज़माना क्या कहिये अंजाम की कोई परवाह़ ही नहीं

मसनद़ पे है क़ब्ज़ा ज़ालिम का मज़लूम का कोई रह़बर ही नहीं


हक़ बात यहाँ कहना मुश्किल है बचके यहाँ रहना मुश्किल

इल्ज़ाम लगाकर चोरी का और कहतें है गऊ तस्कर है यही


बदमाश़ है इनमें ये सारे ग़ुडें है ये इनसांन नहीं ये दरिंदें है

क़ानून को अपने हाथों में लेकर कहतें है बस गऊ रक्षा है यही


सरकार खड़ी ख़ामोंश रही वो काम अपना यूँ करतें रहें

हर बार झूठे इल्ज़ामों में मुस्लिम इनके हाँथों मरते ही रहे


और मुस्लिम मरे तो पुनः मिलें आरिफ़ और ब्राह्मण मरे तो श्राप

हर रोज़ ग़ुडें अधर्मि लोगों से इनसांनियत यूँ ही मरती ही रही




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