मज़लूम जनता दग़ा सह कर भी वफ़ादार होती है और सेयासी लोग दग़ा देकर भी वफ़ादार बनते हैं

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ज़ालिमों श़र पसंदों की सेयासत में क़द्रो ऐह़तेराम है जितना मज़लूमों बेबसों पर बाक़ी अभी ज़ुल्म का अंजाम है उतना,

ओह़दे रस़ूख़ वालो के अक़्ल की दुनिया देख ली आरिफ़ यहां हक़ और बात़िल के मीज़ान में फ़र्क़ और पहचान है कितना





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