(इनसांनियत से मोहब्बत़)

Hindi Urdu Poetry Stories
By -
0
हुक़ूमत हो किसी की भी कैसी परवाह ना करे चाहे हो गर्दिशे़ ज़ुल्मत

वही जांबाज़े सिपाह़ी असल मे कौ़मो मिल्लत़ के सरताजो सरद़ार बनते है

✍मोहम्मद आरिफ़ इलाहाबादी

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

Please Select Embedded Mode To show the Comment System.*