(हक़ीक़त हुब्ब़े वत़नी की..सच्चाई देश़प्रेमी की)

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मुझे अफ़सोस है के जो ख़ुद को मुल्क़ का रहबऱो हमदर्द़ कहते है

वो ख़ुद देखे वो कैसे है जो उर्द़ू बोलने वालो को दहश़त गर्द कहते है
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ज़रा ये पूछ ले के है कोई हुब्बे़ वत़नी का सबूत़ उनके घराने मे

जो रातों दिन मुसलमांं क़ौम को बुरे और बद़बख़्त कहते है

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के तारीख़े भी बंया करती रही है वत़न मे हमेश़ा से मुसलमां क़ौम की वफ़ादारी

और ऐक ये है के मोहिब्बे़ वत़न से करके दुश़्मनी अपनी वत़न के दुश़्मनो को अपना यारो मदद़गार कहते है
                   
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                 ✒मोहम्मद आरिफ़ इलाहाबादी
               


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