हमारे दीन मज़हब की पहचान इन्सानियत मोहब्बत

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मत पूछिए हमसे के मेरा दीन कैसा है

मेरा ये धर्म मज़हब भी मेरे ईमान जैसा है


सदाक़त का सलीक़ा हमसे है सीखा ज़माने ने

मोहब्बत करके दिखला दी जहाँ में प्यार कैसा है,


मैंने अस्लाफ़ से सीखें है अद़बो इल्म की समझदारी

जो मेरे हुस्ने अख़्लाक़ के म्यांन में तलवार जैसा है,


ख़ोदा के फ़ज़्ल ने बख़्श़ी ऐसी फ़ौक़ियत आरिफ़

मेरा आद़ाब है जैसा जहाँ में मेरा ऐज़ाज़ वैसा है,


किया बद़नाम है हमको जहां में कुछ सेयासत ने

वर्ना मेरे अक़्वाल है अच्छे मेरा आमाल अच्छा है,


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