(आश़िक़ की तड़प उसकी मोहब्बत़़ की गुफ्तगू अंदाज़े श़ायराना मे)

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ये कैसा सित़म है के ख़फा भी हमी से वफ़ा भी हमी से मेरा प्यार तुमसे तुम्हारा हमी से

ये सांसे सलामत है जब तक जहां मे चलूंगा तेरे साथ हर दम क़दम बा क़दम से

किसी को जो अपना है माना तो हमने दिया हर वक़्त मुश़्किल घड़ी मे साथ उसका

वफ़ा की रूसवाई की जहां बात आई तो हम भी दे देंगे मोहब्बत़़ का बदला ये सर के क़लम से

गर भरोसा करो और मेरा दिल एैसे यूँही ना तोड़ो तो श़िक्वे श़िक़ायत के मौक़े ना दूंगा

मोहब्बत़़ मै करता हूँ आश़िक़ तुम्हारा के जीना सकूंगा बिना अब तुम्हारे क़सम की क़सम है क़सम की क़सम से



                 ✒मोहम्मद आरिफ़ इलाहाबादी
                 


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