(क़यामत़ का दिन)

Hindi Urdu Poetry Stories
By -
0
क़यामत़ टूट पड़ती है उस रोज़ जिगर छलनी हो जाता है

कोई बाप जब जवान बेटे का जनाज़ा अपने काधें पर उठाता है

✒मोहम्मद आरिफ़ इलाहाबादी

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

Please Select Embedded Mode To show the Comment System.*